साधना की सिद्धता - कब, कहाँ, कैसे और किसलिए हुई.

शुरुआती दिनों में श्री भैरवनाथ ने वंदनीय दादा को जगत कल्याण हेतु ॐकार का एक दिव्य अनुभव प्रदान किया था. वर्ष 1977 से 1978 के दौरान परमपूज्य बाबा के मार्गदर्शन के अनुसार दादा ने श्री क्ष्रेत्र नरसोबावाडी स्थित श्री नृसिंह सरस्वती महाराज की पवित्र भूमि पर हवनविधि तथा महारुद्र याग कर ॐकार के प्रखर स्वरुप को सौम्य बनाया और स्त्री-पुरुष के भेदभाव को त्याग कर सभी भक्तों में उसे प्रवाहित किया. तत्पश्चात् भक्तों को महाकारण दीक्षा दे कर जीवन सार्थक करने की पहल की और जनसामान्य का कल्याण करने की क्षमता रखने वाली ॐकार साधना की सिद्धता प्राप्त करने हेतु शुरुआत की. इस सिद्धि की अलौकिकता इसीलिए महत्वपूर्ण बनी क्योंकि उत्पत्ति-स्थिति-लय में समाहित शक्ति जिन विविध देवीदेवताओं के माध्यम से प्रकट होती है,, वंदनीय दादा ने विभूतियों से मार्गदर्शन प्राप्त करते हुए उन सारे देवीदेवताओं का आशीर्वाद उनके सिद्ध पवित्र स्थानों पर जा का प्राप्त किया. वर्ष 1987 के बलिप्रतिपदा के दिन उन्होंने ॐकार साधना तथा जगदगुरु नामस्मरण "ॐ श्री साईंनाथाय नमः " दोनों की पूर्ण साधना सिद्धि प्राप्त की.

ॐकार की उपासना कार्यान्वित होने से उस साधना की परिणति अथवा फलश्रुति किस तरह प्राप्त होगी इसका ज्ञान यदि किसी साधक को प्राप्त हो तो वह जिज्ञासु अथवा मुमुक्षु वह साधना करने के लिए अवश्य तत्पर होगा. विश्वशांति तथा विश्वैक्यता यदि सिद्ध करनी हो तो उसकी प्राप्ति को साधन का भी सूक्ष्म होना आवश्यक है. जिससे यह विश्वव्यापी हो सके. 'ॐ' यह अनाहत ध्वनि ऐसा ही सूक्ष्म है. उसके लिए भाषा, देश, वर्ण, वंश, धर्म इत्यादि मर्यादाओं' के नहीं होने के कारण वह विश्वव्यापी है. नाथ परंपरा के अनुसार साधन सेवा संचित कर के रखने की वस्तु न हो कर उसका इस तरह सेवन किया जाना चाहिए जिससे की वह समग्र शरीर में रक्त के माध्यम से प्रवाहित हो जिससे गुरु का कृपापूर्ण आशीर्वाद पुरुष के वीर्य के माध्यम से अथवा स्त्रीबीज के माध्यम से संतान में प्रवाहित हो सके. रक्त में समाहित गुरुशक्ति के स्पंदन साधक के शरीर के माध्यम से बाहरी वातावरण में वलय के रूप में विस्तारित होते है.

इसी कार्यपद्धति से गुरु के माध्यम से भक्त के शरीर में हुए शक्ति संक्रमण के कारण गुरु निराकार हो कर भक्त का रूप साकार होता है. और वह अन्यों को साकार कराने का कार्य साधना के द्वारा करता है. परमपूज्य बाबा की ऐसी योजना रही है की भविष्य में गुरुशक्ति ॐकार साधना के द्वारा कार्यान्वित हो और मानवी जीवन ईश्वरमय हो. दादा का तो मानो जन्म ही इसीलिए हुआ था. उन्होंने बाबा की आज्ञा से ॐकार ध्वनि सिद्ध कर साधारण मानव के जीवन में उसे दैनंदिन साधना के रूप में स्थापित किया. इस तरह सिद्ध की हुई ॐकार साधना में दैहिक - आत्मिक तथा गुरुशक्ति जैसी त्रिगुणात्मक शक्ति एकीकृत हो कर साधक द्वारा ब्रह्मरंध्र में धारण की जाती है और तब साधक का मानव देह मनसा - वाचा - कर्मणा अन्य लोगों का कल्याण करने के लिए सक्षम होता है. यूं कहें कि मानव देह स्वयं एक शक्तिपीठ की तरह कार्य करता है. इसी कारण साधक का पहले वाला कर्माधीन जीवन बदल कर गुरुकृपाशीर्वाद के अधीन हो जाता है. इससे श्रेष्ठ मुक्ति कोई और क्या होगी.

ॐकार साधना का सम्पूर्ण प्रशिक्षण व प्रत्यक्ष प्रदर्शन देने वाली डीवीडी भावार्थ मार्गदर्शिका पुस्तक के प्रथम खंड के साथ और अलग से भी उपलब्ध कराई जा रही है. हमारा यह विश्वास है. कि उसमें दी गई सूचनाओं का अक्षरशः पालन करने से, किसी की भी मध्यस्थता के बगैर जिज्ञासु व्यक्ति स्वयं घर बैठे यह प्रशिक्षण पा सकेंगे.

ऐसी भी एक संभावना प्रतीत हो रही है की 27 मिनटों की सम्पूर्ण साधना करने का समय न मिले अथवा भाषा की अड़चन के कारण यह संभव न हो पाए ऐसे में, केवल ध्वनि से जिसका संबंध है ऐसे 21 लघु ॐकार , दीर्घ ॐकार (पांच न्यास) तथा अपनी भाषा में "दैनदिन प्रार्थना "इतना अभ्यास यदि 12 मिनटो में किया जाय तब भी यह संक्षिप्त ॐकार साधना प्रभावी होगी. वंश, धर्म, भाषा, देश जैसी मर्यादाओं से परे यह लघु ॐकार साधना सही मायने ने विश्वव्यापी है.

इस वेबसाइट पर अन्यत्र ॐकार साधना प्रशिक्षण तथा प्रत्यक्ष प्रदर्शन के कुछ अंश दिये गये है.

साधना की डीवीडी में कुल 8 ट्रैक है. ट्रैक 1 तथा 8 में श्री साई के स्तवन के पद है. बाकी 2 से 7 का विवरण निम्नानुसार है.

ट्रैक क्रमांक ॐकार साधना प्रदर्शन समय (मिनटों मे)
2 प्रस्तावना : सिद्धता, सर्वव्यापकता तथा उपयुक्तता 9
3 प्रशिक्षण : स्वर - ताल - लय 7
4 प्रशिक्षण : साधना की पूर्वतैयारियां 4
5 प्रशिक्षण : लघु ॐकार तथा न्यास 9
6 प्रशिक्षण : ईशस्तवन, मारूति स्त्रोत्र नामस्मरण, महामंत्र, प्रार्थना 11
7 प्रात्यक्षिक : संपूर्ण ॐकार साधना 27

संक्षिप्त ॐकार साधना के प्रत्यक्ष प्रदर्शन के कुछ अंश भी वेबसाइट पर दिए गए है.

ट्रस्ट की ओर से साधना के प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाती है.

अधिक से अधिक जिज्ञासु जन इसका लाभ उठाएंयही हमारी श्री सदगुरु के चरणों में प्रार्थना है.